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"हर रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचता...", प्रेम संबंध और चरित्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

 Edited By: Malaika Imam @MalaikaImam1
 Published : Jun 09, 2026 04:54 pm IST,  Updated : Jun 09, 2026 05:02 pm IST

सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाते हुए कहा कि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी भी तरह से उनका चरित्र आंकने का पैमाना नहीं हो सकते।

सुप्रीम कोर्ट- India TV Hindi
सुप्रीम कोर्ट Image Source : PEXELS.COM/PTI

नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने निजी स्वतंत्रता, सहमति और आधुनिक समाज के बदलते रिश्तों को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी भी तरह से उनका चरित्र आंकने का पैमाना नहीं हो सकते। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर कोई रिश्ता शादी तक नहीं पहुंच पाता, तो उसे अपने आप में धोखा या अपराध नहीं माना जाना चाहिए।

जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा, "दो बालिगों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र को लेकर नकारात्मक राय नहीं बनाई जा सकती। देश का ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो बालिगों को अपनी मर्जी से रिश्ता रखने से रोकता हो।"

पुलिस कांस्टेबल की भर्ती से जुड़ा मामला

यह पूरा मामला तेलंगाना के एक पुलिस कांस्टेबल अभ्यर्थी गाजुला तिरुपति की भर्ती से जुड़ा हुआ था। तिरुपति का चयन सिर्फ इसलिए रद्द कर दिया गया था, क्योंकि एक दशक से भी पहले पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ उनके रिश्ते को लेकर एक आपराधिक मामला दर्ज हुआ था। हालांकि, बाद में यह मामला आपसी समझौते से सुलझ गया था। सुप्रीम कोर्ट ने न केवल उस उम्मीदवार को राहत दी, बल्कि इस बहाने समाज, कानून और व्यक्तिगत आजादी के चौराहे पर खड़े एक बड़े सवाल का जवाब दिया। पीठ ने कहा, "हर रिश्ता शादी के मुकाम तक नहीं पहुंचता। इसलिए, केवल इस आधार पर कि रिश्ता शादी में नहीं बदला, यह मान लेना गलत होगा कि एक पक्ष ने दूसरे के साथ धोखाधड़ी की है।"

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि सामाजिक हकीकतें अब बदल चुकी हैं और सरकारी विभागों या संस्थाओं को पुराने ढर्रे और रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलना होगा। अदालत ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर दो बालिग कुछ साल तक किसी रिश्ते में रहते हैं, तो कानूनी तौर पर यह माना जाएगा कि वह रिश्ता आपसी सहमति पर आधारित था। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में शादी के झूठे वादे का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने के आरोपों के तहत दर्ज आपराधिक मुकदमों को सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई बार खारिज कर चुका है।

"विभाग को उम्मीदवार के चरित्र पर उंगली उठाने का कोई हक नहीं"

इस मामले में कोर्ट ने नियोक्ता की इस सोच पर भी कड़ी आपत्ति जताई कि अगर मामला समझौते से खत्म हुआ है, तो इसका मतलब उम्मीदवार दोषी है। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया, "नियोक्ता केवल तब उम्मीदवार को अयोग्य मान सकता था, जब इस बात के सबूत होते कि शिकायतकर्ता महिला को समझौते के लिए डराया-धमकाया गया था। इस मामले में ऐसा कुछ नहीं था।" कोर्ट ने कहा, "महिला को रिश्ते में धोखा दिया गया था या नहीं, यह सिर्फ वही बता सकती थी। जनता या कोई विभाग खुद से यह अंदाजा नहीं लगा सकता। जब महिला ने केस आगे नहीं बढ़ाया और मामला खत्म कर दिया, तो विभाग को खुद से कयास लगाकर उम्मीदवार के चरित्र पर उंगली उठाने का कोई हक नहीं है।"

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